क्या सही में अच्छे दिन आ पायेंगे?

अभी इन दिनों चुनावी मौसम में सारी पार्टियां अपने को अच्छा और दूसरी पार्टियों को बुरा बताने के लिए तरह तरह का तर्क देते नहीं थक रही हैं।वो मतदाताओ को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए एक से बढ़ कर एक लोक लुभावन चुनावी वादें कर रही हैं।लेकिन लाख टके का सवाल ये हैं की इस देश में जहाँ कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर हैं और जहाँ लोगों को मौका मिलने पे लाइन तोड़ के कुछ भी करने की प्रवृर्ति हैं वहां कोई भी सरकार कौन सा अच्छा दिन ले आएगी।

जैसा की एक प्रचलित कहावत हैं की जिसकी लाठी उसकी भैस और हमारे प्रकृति में भी बलवान जानवर कमजोर जानवरों का शिकार करते या उनको दबाते हैं ठीक वैसे ही हमारे भारत में अभी भी सब कुछ चल रहा हैं।पुलिस की वर्दी में चलने वाला आदमी अपनी ताकत को दिखाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देता तो वही सडक़ पे भी जंगल वाला कानून साफ दीखता हैं जहाँ हर बड़ी गाड़ी वाला अपने से छोटी गाड़ी वाले को और गाड़ी में चलने वाला  पैदल चलने वालों से ऐसे पेश आता हैं जैसे उसका  बस चले तो उससे छोटे आकर या औकात वालों का चलना बंद करा दे।

ठीक वैसे ही जो जहाँ हैं ज्यादा से ज्यादा सुविधा भोगी और दूसरे का हक़ मारने में परहेज नहीं करता।
सड़को के किनारे की दुकाने फूटपाथ को प्रयोग करते हुए पैदल यात्रियों के बारे में जरा भी नहीं सोचती।प्रेस एन्क्लेव रोड पर मालवीया नगर मेट्रो स्टेशन से शेख सराय जाते हुए आधी सडक़ पर  मोटर बनाने का गैराज चलता हैं उसी तरह कई स्थानो पर  लोग सडक़ के किनारे पार्किंग करते हैं कई स्थानो पर लोग सड़को पर धार्मिक  या पारिवारिक आयोजन  करते हैं।दिल्ली के एक गाँव की मुख्य सडक़ की गेट को गाँव के कुछ दबंग लोगों ने पिछले २ महीनो से इस लिए  बंद कर दिया हैं ताकि निर्माण सामग्री सडक़ पर ही रख सके मज़े की बात ये हैं की गेट पे जो बोर्ड टंगा हैं उस पर लिखा हैं '' ये आम रास्ता नहीं हैं '' जैसे ये रास्ता किसी राजा के लिए हैं और अभी भी सामंती समय चल रहा हैं।


 एक ऐसे देश में जहाँ जिसे देखो अपने बारे में सोच रहा हो और व्यवस्था ऐसे चल रहा हो जैसे की ये देश  अभी भी सामंती युग में हो वहाँ अच्छे दिन भी  आएंगे समझना मुश्किल हैं।