ये सब कब तक चलेगा ?

हमारे देश में आज़ादी के ६७ साल के बाद भी सही अर्थों में लोकशाही नहीं आ सकी।राजनिति में सारे क्षेत्रों  से लोग आ रहे हैं मानो सांसद बनना एक अवसर हैं जिस से कोई भी जो समर्थवान हैं,वंचित रहना नहीं चाहता।ज्यादातर मामलों में ऐसे लोग न तो देश के लिए कुछ करने कि इक्छा रखते हैं न ही इनका कोई राजनितिक आधार होता हैं।
हमारे तथाकथित लोकतंत्र में फिल्मों से सदा से लोग आते रहे हैं इन में एक दो अपवाद  जयललिता,एन. टी. रामाराव जैसों को  यदि छोड़ दे तो ज्यादातर लोग जैसे कि अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी,गोविंदा,धर्मेन्द्र,शत्रुधन सिन्हा अदि ने सांसद बन के संसद में और अपने क्षेत्र के लोगों कि अपेक्षाए पूरी नहीं कि।ऐसे ही रविकिशन,मनोज तिवारी,किरण खेर,नगमा,राजू श्रीवास्तव,गुल पनाग  अदि को बिभिन पार्टियों ने अपना उम्मीदवार बना के अपनी राजनितिक दिवालियापन को जाहिर किया हैं ।

वैसे ही भूतपूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुदीन एक बार मोरादाबाद से सांसद बन के जब  कुछ नहीं किया तब उन्होंने अपने क्षेत्र को बदल के सवाई माधोपुर चले गए हैं।राज बब्बर पहले समाजवादी पार्टी से आगरा से सांसद चुने गए फिर फ़िरोज़ाबाद से कांग्रेस के टिकट पे सांसद बन गए और अब फिर अपना क्षेत्र बदल के गाजियाबाद से लड़ रहे हैं।ये तो अच्छा हैं ५ साल किसी और पार्टी से सांसद रहो फिर अगर कुछ दिक्कत आ जाये तो पार्टी बदल लो और अगर ५ साल फिर कुछ नहीं किये तो क्षेत्र बदल लो।इसमें ना तो कही कोई आइडियोलॉजी दिखती हैं ना ही कोई नैतिकता और ना ही जनता के प्रति कोई जिम्मेवारी कि भावना। हाँ अगर दिखती हैं तो अवसरवादिता।
उसी तरह क्रिकेटर(मोहम्मद कैफ ,सचिन,अज़हरुद्दीन)सेना के रिटायर अधिकारी यहाँ तक  कि रिटायर्ड जनरल वि.के. सिंह भूतपूर्व सेक्रेटरी आर. के . सिंह, एन. के सिंह,आर एस पाण्डेय,रिटायर्ड पुलिस अधिकारी निखिल कुमार, जैसे लोग पहले अधिकारी रहते हुए जब देश में कुछ नया और जनता के लिए बहुत काम नहीं किया तो अब राजनिति में आ के सत्ता सुख पाने के सिवाऔर क्या करेंगे ?

इस तरह से अगर देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र  क्रिकेटर,सिनेमा कलाकार,रिटायर्ड अधिकारी,नंदन नीलकणि और विजय माल्या जैसे व्यवसायी,मुख़्तार अंसारी,पप्पू यादव,डी.पि यादव,राजा भैया,अतीक अहमद जैसे बाहुबली या फिर वंशवाद कि वजह से  चिराग पासवान जैसे नेताओ कि अगली पीढ़ी कि रखैल बन के रह गयी हैं।मजे कि बात ये हैं कि ये लोग  जब चाहे किसी एक  क्षेत्र में  दाल नहीं गलने पे या हासिये पे चले जाने के बाद राजनिति में आ जाते हैं।

अब ऐसे लोग जो सदा से सुविधाभोगी रहे हैं और अपने सुख आराम को भोगने के सिवा जनता के लिए कुछ खास नहीं किया हो वो जनता के लिए क्या कर देंगे।और जनता हैं कि आँख बंद कर के इनके पीछे लगी जाती हैं।मेरा ये प्रश्न हमारे जैसे उन लोगों से हैं कि क्या हम यूँ ही देखते रहेंगे और आखिर ऐसा कब तक चलेगा।
क्या यहाँ वाकई कोई  विकल्प भी हैं ?

आज कल चुनाव  के मौसम में सारी पार्टियां एक ही रंग में रंगी दिख रही हैं।सब कि सब सत्ता में आने के लिए कुछ भी करने को आतुर दिख रही हैं।सिद्धांत तो वैसे भी  कुछ था ही नहीं,लेकिन इस बार तो बेशर्मी कि हद हो गयी । ऐसे ऐसे नेता हैं जिन्होंने एक दिन पहले पार्टी छोड़ी और दूसरे दिन ही दूसरी पार्टी में टिकट मिल गया।

इसमें सबसे पहला नाम राम कृपाल यादव का हैं जिन्होंने एक दिन पहले रास्ट्रीय जनता दल छोड़ा और दूसरे ही दिन वो भाजपा से उम्मीदवार घोसित कर दिए गए।इसी तरह जगदम्बिका पाल  को भी कांग्रेस से मोह भंग होते ही भाजपा में टिकट मिल गया।महारास्ट्र के एनसीपी मिनिस्टर विजय कुमार गावित कि सुपुत्री हिना गावित  को  भाजपा में शामिल होते  ही टिकट  मिल जाता हैं।

श्रीमुलु और यदुरप्पा  को भी साथ में लेने में भजपा को कोई परेशानी नहीं होती हैं।यही नहीं जिस डी पी यादव को उत्तरप्रदेश में विधान सभा चुनाव के समय अखिलेश यादव ने भी साथ नहीं लेके अपराध के विरुद्ध सख्त होने कि एक छवि बनायीं थी उसके साथ भी भजपा को तालमेल करने में कोई झिझक नहीं होती हैं। ऐसे ही विधान सभा चुनाव के समय भ्रस्टाचार  के आरोपो में घिरे  बाबू सिंह कुसवाहा को भजपा ने अपना लिया था और जनता को ये सन्देश दिया था कि हम औरो से अलग नहीं हैं और इस बार भी लोगों को भाजपा  सन्देश दे रही हैं कि हम में और बाकि पार्टियों में कोई अंतर नहीं हैं और सत्ता में आने के लिए भजपा  किसी भी हद तक जा सकती हैं भजपा का  कोई सिद्धान्त नहीं हैं।

समझ में नहीं आता कि भारत में कौन सा तंत्र चल रहा हैं जिसे देखो उसके परिवार के लोग सत्ता में काबिज हैं।भाजपा में  वसुंधरा राजे सिंधिया के पुत्र दुष्यंत सिंह,कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह,साहिब सिंह वर्मा  के पुत्र परवेश सिंह यसवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा प्रमोद महाजन कि पुत्री पूनम महाजन  इस बार लोक सभा में जाने के लिए तैयार हैं।

एक और बात हमारे लोकतंत्र में अज़ीब हैं कि एक ही परिवार के कई सदस्य अलग अलग पार्टियों में शोभा बढ़ा रहे हैं जैसे सिंधिया परिवार कांग्रेस और  भजपा दोनों में नज़र आता हैं, पूर्णिया के सांसद उदय सिंह भजपा में तो उनके भाई एन के सिंह जनता दल यूनाइटेड से राज्य सभा में हैं और उनके बहनोई निखिल कुमार कांग्रेस में हैं ।पप्पू यादव अनेक पार्टियों में घूमने के बाद  रास्ट्रीय जनता दल  में शामिल होके इस बार मधेपुरा से लोकसभा  चुनाव लड़ रहे हैं तो उनकी पत्नी रंजीत रंजन  कांग्रेस के टिकट पर चुनाव  लड़ रही हैं गौरतलब हैं कि वो पहले २००४ में भी सहरसा से कांग्रेस कि सांसद रह चुकी हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न ये हैं कि जब सब जगह एक ही तंत्र राजतंत्र चल रहा हैं और लोकतंत्र हैं ही नहीं तो जनता के पास विकल्प क्या हैं ?इस सब कि ज़ड़ में जनता ही हैं जो अभी भी जात पात कि राजनीति को बढ़ावा देती हैं और जाती के लोगों को वोट देती हैं।जनता इतनी चाटुकार हैं कि नेताओ के पैर छूने के लिए होड़ लगाती हैं।
हाय रे हमारा लोकतंत्र !

हमारे भारत में जिस पार्टी में देखो लोकत्रंत से ज्यादा वंश वाद ही नजर आता हैं 

सबसे पहले उत्तरी  भारत कि बात करते हैं:

१ कांग्रेस में तो जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा और उनके पुत्रो संजय राजीव के बाद सोनिया और पौत्र राहुल गांधी ऐसे नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं जैसे ये गांधी पार्टी हैं  

२.भारतीय जनता पार्टी में भी राज नाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह और जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह  और अब प्रमोद महाजन कि सुपुत्री पूनम महाजन तथा यसवंत  सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा,कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह  को टिकट देके पार्टी ने वंश वाद के रास्ते चलने  का संकेत दिया हैं 

३.नेशनल कॉन्फ्रेन्स में फारुख के बाद ओमर अब्दुल्लाह  

४.समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव ने अपने भाइयो राम गोपाल यादव,शिव पल सिंह यादव अपने पुत्र अखिलेश यादव पुत्रबधू डिम्पल भतीजे धर्मेन्द्र और अक्षय को राजनीति में ला के कम से कम अपने परिवार में समजवाद लाने  का  उत्त्तम प्रयास किया हैं 

५.चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह रास्ट्रीय  लोकं दल बना के लोगों का कल्याण नहीं अपना कल्याण कर रहे हैं  

६. शिरोमणि अकाली दल में भी प्रकाश सिंह बदल ने अपने पुत्र सुखवीर सिंह बादल और पुत्रबधू हरसिमरत कौर को निहाल किया हैं 

 ७ .हरयाणा के इंडियन नेशनल लोक दल में भी देवीलाल के बाद उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला और उनके पुत्र अजय सिंह चौटाला  और अभय सिंह चौटाला ने ही लोगों के दल से ज्यादा अपना दल बनाया हुआ हैं 

 ८. भजनलाल के बाद उनके पुत्र कुल दीप बिस्नोई ने भी हरयाणा जनहित कांग्रेस पार्टी बना के शायद जनहित तो नहीं बल्कि परिवार  का हित जरूर किया हैं  

९. रास्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी शरद  पवार ने अपनी पुत्री सुप्रिया धुले और अपने भतीजे अजित पवार के द्वारा रास्ट्रवाद को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं 

 १०.शिवशेना में  भी बाला साहेब ठाकरे के बाद  सिवा उनके पुत्र उद्धव के कोई और उनके जैसे  विचारों वाला   नहीं मिला 

११. रास्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के बाद पार्टी में उनके सलें साधू,सुभाष उनकी पत्नी राबरी देवी और अब  उनके पुत्रों तेज प्रताप और तेजस्वी यादव और पुत्री मीशा यादव के अलावा सब गौण हैं  

१२.बिहार में एक और पार्टी जन लोक शक्ति पार्टी में राम विलाश पासवान के अलावे उनके भाई राम चन्द्र पासवान और पशुपति पारस और अब उनके पुत्र  चिराग पासवान लोगों कि शक्ति नहीं अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं 
१३.ओड़िशा मैं नवीन पटनायक स्वर्गीय बीजू पटनायक के बाद उनकी विरासत को आगे ले के जाने में कामयाब रहे हैं और पिछले १० सालों से ओड़िशा कि जनता को उनका विकल्प नहीं मिल रहा हैं 

दक्षिणी भारत में भी कुछ इसी प्रकार चल रहा हैं :

१ डी एम् के पार्टी में करूणानिधि के बेटे अलागिरी और स्टालिन और उनकी पुत्री कनिमोझी पार्टी को आगे ले जा रहे हैं

२. स्वर्गीय राज शेखर रेड्डी के पुत्र भी जग मोहन रेड्डी भी अपने पिता के नाम पर एक पार्टी बना के उनकी विरासत को आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं  

इसके अलावा लगभग हर पार्टी में हर स्तर के नेता  अपने बेटे बेटियों रिश्तेदारों  को राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं 

ऐसे में ये प्रश्न उठता है कि क्या हमारे भारत देश में जनतंत्र हैं या ये वंशवाद हैं और अगर ये सब कुछ  चल रहा हैं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं  इस देश कि जनता जब वोट देती हैं तो विकाश को छोड़  के तमाम मुद्दे होते हैं  इस में एक मुद्दा पहचान का होता हैं और इसी लिए सारी पार्टियाँ सांसदों, विधायकों ,मंत्रियों मुख्यमंत्रियों के रीश्तेदारों को तरजीह देती हैं  कुसूर जनता का है कि वो आज़ादी के बाद भी गुलामी और चटुकारिता कि  मानसिकता को छोड़ के आज़ाद देश के नागरिक कि तरह नहीं सोचती  औरविकाश के लिए वोट नहीं करती जब तक ये नहीं होगा तब तक जनतंत्र के नाम पर राजतंत्र चलता रहेगा  



बस हम आखिरी उम्मीद हैं और हम ही सबसे ईमानदार हैं !

आज कल रैलियों का समय आया हुआ हैं ।सारी लैंप पोस्टें  पोस्टरों  और फलैक्स बैनरों से सजा दी गयी हैं ।लैंप पोस्टें भी सज संवर के मनो इठला रही हैं और अपने निचे खुली आसमान के निचे सोने वालों को मुँह चिढ़ा रही हैं कि देखो भावी मसीहा कितना सक्षम हैं कि उसे  सजीव तो सजीव निर्जीव का भी इतना ख्याल हैं।ऐसे में ये सवाल आता हैं कि क्या आज़ादी के बाद जो १५ बार  लोक सभा बनी थी उसमे ऐसे  सांसद नहीं गएँ थे,जैसे इस बार जाने वालें हैं

आम आदमी पार्टी के अरबिंद केजरीवाल कह रहे थे कि उनकी पार्टी सबसे ईमानदार पार्टी हैं और उनकी पार्टी को १०० सीटें मिलेगी और उनकी पार्टी के बिना सरकार नहीं बनेगी ।हालाँकि उन्होंने ये खुलासा नहीं किया कि उनकी  १०० सीटों के बिना  किसकी सरकार नहीं बनेगी या उनकी पार्टी १०० सीटों के साथ और किस किस पार्टी के सहयोग से सरकार बनायेगी।
आज कल अरविन्द  विश्वनाथ प्रताप सिंह कि ही तरह स्विश बैंक  एकाउंट नंबर बताते हैं ,जिसमे मुकेश अम्बानी के पैसे जमा होने कि बात वो करते हैं । क्यूंकि ८९ में इसी तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी एकाउंट नंबर  का उल्लेख करते हुए हुए उसमे राजीव गांधी का पैसा होने कि बात करके लोगों से अपनी ईमानदारी का हवाला देके वोट माँगा था और लोगों को उनमे मशीहा कि झलक दिखने लगी थी।और वो रातों रात ईमानदारी के पर्याय समझे जाने  लगें थे । प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भी वोट बैंक कि राजनीती शुरू कर दी थी ।

लालू प्रसाद यादव भी १५ साल तक गरीबों के मशीहा बने रहे और चारा घोटाला कि वजह से जेल  भी गए ।ऐसे तमाम नेता जो  अपने को समाजवादी और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित बताते हैं । अन्त में अपने या अपने परिवार का ही विकास करते हैं ।मायावती,मुलायम सिंह यादव ,और राम विलाश पासवान वैसे ही कुछ नाम हैं जिन्हे अपनी जाती या सामाज के वोटों का ठेकेदार समझा जाता हैं । सच्चाई ये हैं कि आज़ादी के ६६ साल के बाद भी नारों से ही  सरकार बनती हैं  और जाती गत  राजनीती के आधार पर  नेताओं कि पहचान हैं।  समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को कब तक नेता अपने स्वार्थ के लिए उल्लू बनाएंगे और जनता उल्लू बनती रहेगी।
जल्दीबाजी क्यूँ हैं?
कुछ लोगों ने जल्दीबाजी में सब काम करने का मन बनाया हुआ हैं। वो आनन् फानन में पार्टी बना लेतें हैं । चुनाव में जा के सिट जित के सरकार बनाते हैं । फिर सरकार गिराने  कि जल्दीबाजी में आधारहीन बयानबाजी शुरू करते हैं  और अन्त में बिना पर्याप्त कारणों के सरकार गिरा देते हैं । और हैरत कि बात ये हैं कि अब वो और बड़ी जिम्मेवारी उठाने कि बात करते हुए लोकसभा के चुनाव में लोगों का समर्थन मांगते घूम रहे हैं । उनके अनुसार अब समय नहीं हैं और इसी लिए वो जल्दीबाजी में हैं । लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही हैं कि इतने बड़े देश में जहाँ कि बहुत ही जटिल सामाजिक आर्थिक संरचना हैं वहाँ  ये लोग सब कुछ जल्दी में कैसे ठीक करेंगे । लगता हैं  वो इसको बताना जरूरी नहीं समझ रहे हैं । इसीलिए सब कुछ नारों के अधर पे चल रहा हैं और साफ़ साफ़ कुछ भी नहीं कहा जा रहा हैं और तमाम बिरोधावास आये दिन सामने आ रहे हैं । एक और बात जो लोगों के मन में हैं वो ये हैं कि किसी और पार्टी से  इस पार्टी में आने पे लोग रातों रात  ईमानदार कैसे बन जा रहे हैं। क्या कोई जादूई मशीन हैं इन लोगों के पास जिस से ये लोग लोगों का काया पलट कर देते हैं । और अगर  चुनाव जितने कि काबिलियत ही सब कुछ हैं  तब इस बात कि क्या निश्चितता हैं कि  भविष्य में दूसरी पार्टी से आये हुए लोग पार्टी कि नीतियों को बिना प्रश्न किये मानेंगे । और अगर चुनाव जितना ही इन लोगों कि  प्राथमिकता हैं तब ये  लोग  कैसे कह सकते हैं कि ये  लोग  बाकि पार्टियों से भिन्न हैं और सत्तालोलुप नहीं हैं। मेरे हिसाब से अगर सब कुछ ठीक होता तो इतनी जल्दीबाजी नहीं होती। और हर काम इतना आसान और जल्दी होना होता तो   नेल्सन मंडेला ने  दक्षिणी अफ्रीका में रंग भेद के खिलाफ२७ साल कारावास में नहीं  बिताया होता।