जल्दीबाजी क्यूँ हैं?
कुछ लोगों ने जल्दीबाजी में सब काम करने का मन बनाया हुआ हैं। वो आनन् फानन में पार्टी बना लेतें हैं । चुनाव में जा के सिट जित के सरकार बनाते हैं । फिर सरकार गिराने  कि जल्दीबाजी में आधारहीन बयानबाजी शुरू करते हैं  और अन्त में बिना पर्याप्त कारणों के सरकार गिरा देते हैं । और हैरत कि बात ये हैं कि अब वो और बड़ी जिम्मेवारी उठाने कि बात करते हुए लोकसभा के चुनाव में लोगों का समर्थन मांगते घूम रहे हैं । उनके अनुसार अब समय नहीं हैं और इसी लिए वो जल्दीबाजी में हैं । लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही हैं कि इतने बड़े देश में जहाँ कि बहुत ही जटिल सामाजिक आर्थिक संरचना हैं वहाँ  ये लोग सब कुछ जल्दी में कैसे ठीक करेंगे । लगता हैं  वो इसको बताना जरूरी नहीं समझ रहे हैं । इसीलिए सब कुछ नारों के अधर पे चल रहा हैं और साफ़ साफ़ कुछ भी नहीं कहा जा रहा हैं और तमाम बिरोधावास आये दिन सामने आ रहे हैं । एक और बात जो लोगों के मन में हैं वो ये हैं कि किसी और पार्टी से  इस पार्टी में आने पे लोग रातों रात  ईमानदार कैसे बन जा रहे हैं। क्या कोई जादूई मशीन हैं इन लोगों के पास जिस से ये लोग लोगों का काया पलट कर देते हैं । और अगर  चुनाव जितने कि काबिलियत ही सब कुछ हैं  तब इस बात कि क्या निश्चितता हैं कि  भविष्य में दूसरी पार्टी से आये हुए लोग पार्टी कि नीतियों को बिना प्रश्न किये मानेंगे । और अगर चुनाव जितना ही इन लोगों कि  प्राथमिकता हैं तब ये  लोग  कैसे कह सकते हैं कि ये  लोग  बाकि पार्टियों से भिन्न हैं और सत्तालोलुप नहीं हैं। मेरे हिसाब से अगर सब कुछ ठीक होता तो इतनी जल्दीबाजी नहीं होती। और हर काम इतना आसान और जल्दी होना होता तो   नेल्सन मंडेला ने  दक्षिणी अफ्रीका में रंग भेद के खिलाफ२७ साल कारावास में नहीं  बिताया होता।