हाय रे हमारा लोकतंत्र !
हमारे भारत में जिस पार्टी में देखो लोकत्रंत से ज्यादा वंश वाद ही नजर आता हैं।
सबसे पहले उत्तरी भारत कि बात करते हैं:
१ कांग्रेस में तो जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा और उनके पुत्रो संजय राजीव के बाद सोनिया और पौत्र राहुल गांधी ऐसे नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं जैसे ये गांधी पार्टी हैं ।
२.भारतीय जनता पार्टी में भी राज नाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह और जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह और अब प्रमोद महाजन कि सुपुत्री पूनम महाजन तथा यसवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा,कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को टिकट देके पार्टी ने वंश वाद के रास्ते चलने का संकेत दिया हैं।
३.नेशनल कॉन्फ्रेन्स में फारुख के बाद ओमर अब्दुल्लाह ।
४.समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव ने अपने भाइयो राम गोपाल यादव,शिव पल सिंह यादव अपने पुत्र अखिलेश यादव पुत्रबधू डिम्पल भतीजे धर्मेन्द्र और अक्षय को राजनीति में ला के कम से कम अपने परिवार में समजवाद लाने का उत्त्तम प्रयास किया हैं।
५.चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह रास्ट्रीय लोकं दल बना के लोगों का कल्याण नहीं अपना कल्याण कर रहे हैं ।
६. शिरोमणि अकाली दल में भी प्रकाश सिंह बदल ने अपने पुत्र सुखवीर सिंह बादल और पुत्रबधू हरसिमरत कौर को निहाल किया हैं।
७ .हरयाणा के इंडियन नेशनल लोक दल में भी देवीलाल के बाद उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला और उनके पुत्र अजय सिंह चौटाला और अभय सिंह चौटाला ने ही लोगों के दल से ज्यादा अपना दल बनाया हुआ हैं।
८. भजनलाल के बाद उनके पुत्र कुल दीप बिस्नोई ने भी हरयाणा जनहित कांग्रेस पार्टी बना के शायद जनहित तो नहीं बल्कि परिवार का हित जरूर किया हैं ।
९. रास्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी शरद पवार ने अपनी पुत्री सुप्रिया धुले और अपने भतीजे अजित पवार के द्वारा रास्ट्रवाद को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।
१०.शिवशेना में भी बाला साहेब ठाकरे के बाद सिवा उनके पुत्र उद्धव के कोई और उनके जैसे विचारों वाला नहीं मिला।
११. रास्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के बाद पार्टी में उनके सलें साधू,सुभाष उनकी पत्नी राबरी देवी और अब उनके पुत्रों तेज प्रताप और तेजस्वी यादव और पुत्री मीशा यादव के अलावा सब गौण हैं ।
१२.बिहार में एक और पार्टी जन लोक शक्ति पार्टी में राम विलाश पासवान के अलावे उनके भाई राम चन्द्र पासवान और पशुपति पारस और अब उनके पुत्र चिराग पासवान लोगों कि शक्ति नहीं अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं।
१३.ओड़िशा मैं नवीन पटनायक स्वर्गीय बीजू पटनायक के बाद उनकी विरासत को आगे ले के जाने में कामयाब रहे हैं और पिछले १० सालों से ओड़िशा कि जनता को उनका विकल्प नहीं मिल रहा हैं।
दक्षिणी भारत में भी कुछ इसी प्रकार चल रहा हैं :
१ डी एम् के पार्टी में करूणानिधि के बेटे अलागिरी और स्टालिन और उनकी पुत्री कनिमोझी पार्टी को आगे ले जा रहे हैं
२. स्वर्गीय राज शेखर रेड्डी के पुत्र भी जग मोहन रेड्डी भी अपने पिता के नाम पर एक पार्टी बना के उनकी विरासत को आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं ।
इसके अलावा लगभग हर पार्टी में हर स्तर के नेता अपने बेटे बेटियों रिश्तेदारों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं।
ऐसे में ये प्रश्न उठता है कि क्या हमारे भारत देश में जनतंत्र हैं या ये वंशवाद हैं और अगर ये सब कुछ चल रहा हैं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं । इस देश कि जनता जब वोट देती हैं तो विकाश को छोड़ के तमाम मुद्दे होते हैं। इस में एक मुद्दा पहचान का होता हैं और इसी लिए सारी पार्टियाँ सांसदों, विधायकों ,मंत्रियों मुख्यमंत्रियों के रीश्तेदारों को तरजीह देती हैं। कुसूर जनता का है कि वो आज़ादी के बाद भी गुलामी और चटुकारिता कि मानसिकता को छोड़ के आज़ाद देश के नागरिक कि तरह नहीं सोचती औरविकाश के लिए वोट नहीं करती। जब तक ये नहीं होगा तब तक जनतंत्र के नाम पर राजतंत्र चलता रहेगा ।
हमारे भारत में जिस पार्टी में देखो लोकत्रंत से ज्यादा वंश वाद ही नजर आता हैं।
सबसे पहले उत्तरी भारत कि बात करते हैं:
१ कांग्रेस में तो जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा और उनके पुत्रो संजय राजीव के बाद सोनिया और पौत्र राहुल गांधी ऐसे नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं जैसे ये गांधी पार्टी हैं ।
२.भारतीय जनता पार्टी में भी राज नाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह और जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह और अब प्रमोद महाजन कि सुपुत्री पूनम महाजन तथा यसवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा,कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को टिकट देके पार्टी ने वंश वाद के रास्ते चलने का संकेत दिया हैं।
३.नेशनल कॉन्फ्रेन्स में फारुख के बाद ओमर अब्दुल्लाह ।
४.समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव ने अपने भाइयो राम गोपाल यादव,शिव पल सिंह यादव अपने पुत्र अखिलेश यादव पुत्रबधू डिम्पल भतीजे धर्मेन्द्र और अक्षय को राजनीति में ला के कम से कम अपने परिवार में समजवाद लाने का उत्त्तम प्रयास किया हैं।
५.चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह रास्ट्रीय लोकं दल बना के लोगों का कल्याण नहीं अपना कल्याण कर रहे हैं ।
६. शिरोमणि अकाली दल में भी प्रकाश सिंह बदल ने अपने पुत्र सुखवीर सिंह बादल और पुत्रबधू हरसिमरत कौर को निहाल किया हैं।
७ .हरयाणा के इंडियन नेशनल लोक दल में भी देवीलाल के बाद उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला और उनके पुत्र अजय सिंह चौटाला और अभय सिंह चौटाला ने ही लोगों के दल से ज्यादा अपना दल बनाया हुआ हैं।
८. भजनलाल के बाद उनके पुत्र कुल दीप बिस्नोई ने भी हरयाणा जनहित कांग्रेस पार्टी बना के शायद जनहित तो नहीं बल्कि परिवार का हित जरूर किया हैं ।
९. रास्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी शरद पवार ने अपनी पुत्री सुप्रिया धुले और अपने भतीजे अजित पवार के द्वारा रास्ट्रवाद को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।
१०.शिवशेना में भी बाला साहेब ठाकरे के बाद सिवा उनके पुत्र उद्धव के कोई और उनके जैसे विचारों वाला नहीं मिला।
११. रास्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के बाद पार्टी में उनके सलें साधू,सुभाष उनकी पत्नी राबरी देवी और अब उनके पुत्रों तेज प्रताप और तेजस्वी यादव और पुत्री मीशा यादव के अलावा सब गौण हैं ।
१२.बिहार में एक और पार्टी जन लोक शक्ति पार्टी में राम विलाश पासवान के अलावे उनके भाई राम चन्द्र पासवान और पशुपति पारस और अब उनके पुत्र चिराग पासवान लोगों कि शक्ति नहीं अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं।
१३.ओड़िशा मैं नवीन पटनायक स्वर्गीय बीजू पटनायक के बाद उनकी विरासत को आगे ले के जाने में कामयाब रहे हैं और पिछले १० सालों से ओड़िशा कि जनता को उनका विकल्प नहीं मिल रहा हैं।
दक्षिणी भारत में भी कुछ इसी प्रकार चल रहा हैं :
१ डी एम् के पार्टी में करूणानिधि के बेटे अलागिरी और स्टालिन और उनकी पुत्री कनिमोझी पार्टी को आगे ले जा रहे हैं
२. स्वर्गीय राज शेखर रेड्डी के पुत्र भी जग मोहन रेड्डी भी अपने पिता के नाम पर एक पार्टी बना के उनकी विरासत को आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं ।
इसके अलावा लगभग हर पार्टी में हर स्तर के नेता अपने बेटे बेटियों रिश्तेदारों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं।
ऐसे में ये प्रश्न उठता है कि क्या हमारे भारत देश में जनतंत्र हैं या ये वंशवाद हैं और अगर ये सब कुछ चल रहा हैं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं । इस देश कि जनता जब वोट देती हैं तो विकाश को छोड़ के तमाम मुद्दे होते हैं। इस में एक मुद्दा पहचान का होता हैं और इसी लिए सारी पार्टियाँ सांसदों, विधायकों ,मंत्रियों मुख्यमंत्रियों के रीश्तेदारों को तरजीह देती हैं। कुसूर जनता का है कि वो आज़ादी के बाद भी गुलामी और चटुकारिता कि मानसिकता को छोड़ के आज़ाद देश के नागरिक कि तरह नहीं सोचती औरविकाश के लिए वोट नहीं करती। जब तक ये नहीं होगा तब तक जनतंत्र के नाम पर राजतंत्र चलता रहेगा ।