बस हम आखिरी उम्मीद हैं और हम ही सबसे ईमानदार हैं !

आज कल रैलियों का समय आया हुआ हैं ।सारी लैंप पोस्टें  पोस्टरों  और फलैक्स बैनरों से सजा दी गयी हैं ।लैंप पोस्टें भी सज संवर के मनो इठला रही हैं और अपने निचे खुली आसमान के निचे सोने वालों को मुँह चिढ़ा रही हैं कि देखो भावी मसीहा कितना सक्षम हैं कि उसे  सजीव तो सजीव निर्जीव का भी इतना ख्याल हैं।ऐसे में ये सवाल आता हैं कि क्या आज़ादी के बाद जो १५ बार  लोक सभा बनी थी उसमे ऐसे  सांसद नहीं गएँ थे,जैसे इस बार जाने वालें हैं

आम आदमी पार्टी के अरबिंद केजरीवाल कह रहे थे कि उनकी पार्टी सबसे ईमानदार पार्टी हैं और उनकी पार्टी को १०० सीटें मिलेगी और उनकी पार्टी के बिना सरकार नहीं बनेगी ।हालाँकि उन्होंने ये खुलासा नहीं किया कि उनकी  १०० सीटों के बिना  किसकी सरकार नहीं बनेगी या उनकी पार्टी १०० सीटों के साथ और किस किस पार्टी के सहयोग से सरकार बनायेगी।
आज कल अरविन्द  विश्वनाथ प्रताप सिंह कि ही तरह स्विश बैंक  एकाउंट नंबर बताते हैं ,जिसमे मुकेश अम्बानी के पैसे जमा होने कि बात वो करते हैं । क्यूंकि ८९ में इसी तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी एकाउंट नंबर  का उल्लेख करते हुए हुए उसमे राजीव गांधी का पैसा होने कि बात करके लोगों से अपनी ईमानदारी का हवाला देके वोट माँगा था और लोगों को उनमे मशीहा कि झलक दिखने लगी थी।और वो रातों रात ईमानदारी के पर्याय समझे जाने  लगें थे । प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भी वोट बैंक कि राजनीती शुरू कर दी थी ।

लालू प्रसाद यादव भी १५ साल तक गरीबों के मशीहा बने रहे और चारा घोटाला कि वजह से जेल  भी गए ।ऐसे तमाम नेता जो  अपने को समाजवादी और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित बताते हैं । अन्त में अपने या अपने परिवार का ही विकास करते हैं ।मायावती,मुलायम सिंह यादव ,और राम विलाश पासवान वैसे ही कुछ नाम हैं जिन्हे अपनी जाती या सामाज के वोटों का ठेकेदार समझा जाता हैं । सच्चाई ये हैं कि आज़ादी के ६६ साल के बाद भी नारों से ही  सरकार बनती हैं  और जाती गत  राजनीती के आधार पर  नेताओं कि पहचान हैं।  समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को कब तक नेता अपने स्वार्थ के लिए उल्लू बनाएंगे और जनता उल्लू बनती रहेगी।