क्या यहाँ वाकई कोई  विकल्प भी हैं ?

आज कल चुनाव  के मौसम में सारी पार्टियां एक ही रंग में रंगी दिख रही हैं।सब कि सब सत्ता में आने के लिए कुछ भी करने को आतुर दिख रही हैं।सिद्धांत तो वैसे भी  कुछ था ही नहीं,लेकिन इस बार तो बेशर्मी कि हद हो गयी । ऐसे ऐसे नेता हैं जिन्होंने एक दिन पहले पार्टी छोड़ी और दूसरे दिन ही दूसरी पार्टी में टिकट मिल गया।

इसमें सबसे पहला नाम राम कृपाल यादव का हैं जिन्होंने एक दिन पहले रास्ट्रीय जनता दल छोड़ा और दूसरे ही दिन वो भाजपा से उम्मीदवार घोसित कर दिए गए।इसी तरह जगदम्बिका पाल  को भी कांग्रेस से मोह भंग होते ही भाजपा में टिकट मिल गया।महारास्ट्र के एनसीपी मिनिस्टर विजय कुमार गावित कि सुपुत्री हिना गावित  को  भाजपा में शामिल होते  ही टिकट  मिल जाता हैं।

श्रीमुलु और यदुरप्पा  को भी साथ में लेने में भजपा को कोई परेशानी नहीं होती हैं।यही नहीं जिस डी पी यादव को उत्तरप्रदेश में विधान सभा चुनाव के समय अखिलेश यादव ने भी साथ नहीं लेके अपराध के विरुद्ध सख्त होने कि एक छवि बनायीं थी उसके साथ भी भजपा को तालमेल करने में कोई झिझक नहीं होती हैं। ऐसे ही विधान सभा चुनाव के समय भ्रस्टाचार  के आरोपो में घिरे  बाबू सिंह कुसवाहा को भजपा ने अपना लिया था और जनता को ये सन्देश दिया था कि हम औरो से अलग नहीं हैं और इस बार भी लोगों को भाजपा  सन्देश दे रही हैं कि हम में और बाकि पार्टियों में कोई अंतर नहीं हैं और सत्ता में आने के लिए भजपा  किसी भी हद तक जा सकती हैं भजपा का  कोई सिद्धान्त नहीं हैं।

समझ में नहीं आता कि भारत में कौन सा तंत्र चल रहा हैं जिसे देखो उसके परिवार के लोग सत्ता में काबिज हैं।भाजपा में  वसुंधरा राजे सिंधिया के पुत्र दुष्यंत सिंह,कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह,साहिब सिंह वर्मा  के पुत्र परवेश सिंह यसवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा प्रमोद महाजन कि पुत्री पूनम महाजन  इस बार लोक सभा में जाने के लिए तैयार हैं।

एक और बात हमारे लोकतंत्र में अज़ीब हैं कि एक ही परिवार के कई सदस्य अलग अलग पार्टियों में शोभा बढ़ा रहे हैं जैसे सिंधिया परिवार कांग्रेस और  भजपा दोनों में नज़र आता हैं, पूर्णिया के सांसद उदय सिंह भजपा में तो उनके भाई एन के सिंह जनता दल यूनाइटेड से राज्य सभा में हैं और उनके बहनोई निखिल कुमार कांग्रेस में हैं ।पप्पू यादव अनेक पार्टियों में घूमने के बाद  रास्ट्रीय जनता दल  में शामिल होके इस बार मधेपुरा से लोकसभा  चुनाव लड़ रहे हैं तो उनकी पत्नी रंजीत रंजन  कांग्रेस के टिकट पर चुनाव  लड़ रही हैं गौरतलब हैं कि वो पहले २००४ में भी सहरसा से कांग्रेस कि सांसद रह चुकी हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न ये हैं कि जब सब जगह एक ही तंत्र राजतंत्र चल रहा हैं और लोकतंत्र हैं ही नहीं तो जनता के पास विकल्प क्या हैं ?इस सब कि ज़ड़ में जनता ही हैं जो अभी भी जात पात कि राजनीति को बढ़ावा देती हैं और जाती के लोगों को वोट देती हैं।जनता इतनी चाटुकार हैं कि नेताओ के पैर छूने के लिए होड़ लगाती हैं।